उत्तराखंड में मौत की कब्रगाह बन रही हाइड्रो टनल्स

उत्तराखंड की जलविद्युत परियोजनाओं के लिए बनाई जा रही टनलें मौत की कब्रगाह बनती जा रही है। इसके चलते परियोजना में काम कर रहे मजदूरों और कर्मचारियों के सामने जीवन का संकट खडा होता रहा है। इस तरह के हालातों के चलते परिजनों की भी नींद उडती जा रही है।
दरअसल, उत्तराखंड में जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण के साथ ही रेल लाइन और सड़क मार्ग पर भी टनलों का निर्माण लंबे अर्से से किया जा रहा है। टनलों के निर्माण से तमाम मजदूर जिंदा दफन होते जा रहे है। इस तरह के हालातों के चलते कई मजदूर असमय मौत के शिकार हो रहे हैं तो परिजनों की भी नींद उडती जा रही है। चमोली जिले में ही विष्णुप्रयाग जलविद्युत परियोजना के निर्माण के दौरान सुरंग की खुदाई में कई मजदूर जिंदा दफन हो गए थे। इसके बाद भी यह सिलसिला तमाम परियोजनाओ की टनलों के निर्माण में चलता रहा।
वर्ष 2021 में हिम प्रलय के चलते चमोली जिले के रैणी में विद्युत परियोजना में एक दर्जन से अधिक मजदूर अकाल मौत के शिकार हुए थे। इस हिम प्रलय के चलते तपोवन-विष्णुगाड जल विद्युत परियोजना की टनल में पानी का सैलाब आने से 200 से अधिक मजदूर और कर्मचारी भी जिंदा दफन हो गए थे। इस घटना ने हर एक को विचलित कर रख दिया था।
इतनी बड़ी संख्या में मजदूरों तथा कर्मचारियों की मौत से परियोजना की कार्य प्रणाली पर सवाल उठ खडे को गए थे। हालांकि तब इसे एक प्राकृतिक आपदा के रूप में लिया गया था। फिर भी तमाम परिजन आज भी अपनों को खोने का गम नहीं भुला पा रहे हैं।
इस हादसे से लोग उभर ही पा रहे थे कि उत्तरकाशी की सिलक्यारा टनल में 12 नवंबर 2023 को 41 मजदूर फंस गए थे। 4.531 किमी टू लेन की इस सुरंग का निर्माण सिलक्यारा-बैंड-बडकोट टनल को चारधाम परियोजना के निमित बनाया जा रहा था। टनल में फंसे मजदूरों को सुरक्षित निकालने के लिए 400 घंटे से अधिक यानि 17 दिन लगे। यह सौभाग्य रहा कि हादसे में फंसे 41 मजदूर सुरक्षित बच निकले 28 नवंबर को सभी मजदूरों को बाहर निकाला गया था। इस हादसे में सिलक्यारा की ओर लगभग 60 मीटर के हिस्से में मलवा गिरकर रास्ता बंद हो गया था। इस दौर में भी सरकार ने ठोस कदमों के साथ आगे बढ कर सभी मजदूरों की जान बचाई थी।
टीएचडीसी की विष्णुगाड-पीपलकोटी जलविद्युत परियोजना की टनल ने भू-धंसाव और पानी के रिसाव के जद में आने के कारण आठ मजदूर जिंदा दफन हो गए हैं। इस हादसे में अभी भी दो मजदूर लापता चल रहे हैं। कहा जा सकता है कि मजदूरों और कर्मचारियों के लिए टनले मौत की कब्रगाह बनती जा रही हैं। इस स्थिति ने मजदूरों के परिजनों की भी नींद उडा कर रख दी है। परियोजना में काम कर रहे मजदूर भी अब अपने को असुरक्षित मान कर चल रहे हैं।
उत्तराखंड के टिहरी जनपद के गेंवाल गांव के प्रदीप पंवार की तो 13 अप्रैल को शादी हुई थी। प्रदीप की मौत के बाद अब उसके परिजनों के सामने मुश्किलें खडी हो गई है। इसी तरह उर्गम घाटी के मुकेश के परिजनों के सामने भी संकट आ खडा हो गया है। परिजनों के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। अभी हाल ही में सीमांत नीती घाटी में तमक नाले के उफान पर आने के चलते बैलीब्रिज भी आपदा की भेंट चढ गया था। हालांकि इस घटना में भी एक मजदूर का अभी तक कोई पता नहीं चल पाया है।
इस तरह कहा जा सकता है कि उत्तराखंड आपदा की दृष्टि से बेहद संवेदनशील स्थिति में है। जोन चार और पांच में स्थित होने के कारण इस तरह की घटनाएं लोगों पर काल बरसा रही है। अभी भी हिमालय की संवेदनशीलता को देखते हुए विकास परियोजनाओं के निर्माण में अत्यधिक सर्तकता बरतनी होगी।
हिमालय के विकासमान स्थिति में होने के कारण प्रकृति से अत्यधिक छेडछाड के कारण आए दिन इस तरह की घटनाएं विकराल रूप धारण करती जा रही हैं। हालांकि सरकार के मुखिया पुष्कर सिंह धामी ग्रांउड जीरो पर उतर कर राहत व बचाव कार्यों में तेजी लाकर लोगों को राहत तो दे रहे हैं किंतु अभी भी सधे कदमों के साथ आगे बढने की जरूरत है। ऐसा नहीं किया गया तो भविष्य के खतरे अभी टले नहीं हैं।
रिपोर्ट – वरिष्ठ पत्रकार रजपाल बिष्ट



