
नेपाल की हिमस्खलन के चलते जलप्रलय की आपदा ने एक बार फिर उत्तराखंड को भी अलर्ट मोड़ पर ला खड़ा किया है। उत्तराखंड में भी नेपाल की इस आपदा से इस बात के साफ सकेंत मिल गए है कि इस हिमालय राज्य पर हिमस्खलन का खतरा टला नहीं है। इसके लिए नदियों के तटवर्ती क्षेत्रों में बसागत कर रहे लोगों की सुरक्षा के लिए ठोस नीति तैयार करने की जरूरत भी महसूस की जाने लगी है।
तिब्बत में ग्लेशियर फटने से नेपाल में भारी तबाही होने से असंख्य जाने चली गई है। चीनी अधिकृत तिब्बत से नेपाल होकर आने वाली भोटेकोशी और त्रिशूली नदी में आए जलप्रलय के कारण काठमांडू जिले के उत्तर में स्थित रसुवा जिले में निजी और सरकारी परिसंपतियां मलबे में तब्दील होने के साथ असंख्य जाने भी चले गई। तिब्बत सीमा के पार यकायक आए जलजले से नेपाल में सब कुछ तबाह हो गया। विनाशकारी बाढ़ के बाद अभी भी खतरा टला नहीं है।
कहा जा रहा है कि तिब्बत में हिमस्खलन से बने प्राकृतिक बांध के फटने से यह विनाशकारी घटना सामने आई है। विशेषज्ञ इसे ग्लेशियर लेक आउटवर्स्ट फ्लड का रूप दे रहे हैं। कहा जा रहा कि यह फ्लड तब आता है जब ग्लेशियर द्वारा रोकी गई झील का प्राकृतिक बांध अचानक फट जाता है। तिब्बत से नेपाल की ओर बहने वाली भोटेकोशी और त्रिशूली नदी में जमी बर्फ के पिघलने से यह जलजला आया है। ंहालांकि विशेषज्ञ इसे वैश्विक तापमान में वृद्धि के कारण हिमखंड के टूटकर गिरने को आपदा का प्रमुख कारण मानकर चल रहे हैं।
हिमालयी क्षेत्र में हिमस्खलन की यह कोई नई घटना नहीं है। उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्र में इस तरह की आपदाएं विकराल रूप में आती रही हैं। इस कारण असंख्य जानें तो गई ही अपितु सरकारी और निजी परिसंपतियों को भी भारी नुकसान पहुंचा है। इसके चलते नई बसागत के लिए हिमालय वासियों के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती आ रही है।
उत्तराखंड के गढ़वाल इलाके के चमोली जिले में 1894 में एवलांच आने के कारण गौणाताल फट गया था। इसके चलते अग्रेज शासकों ने 1893 में ही गौणाताल के फटने की आशंका के चलते संचार नेटवर्क को गौणाताल तक स्थापित कर दिया था। गौणाताल 1894 में फटा तो अलकनंदा की बाढ़ ने श्रीनगर तक के इलाके को इस तबाही ने बर्बाद कर रख दिया था। कहा जा सकता है कि ब्रिटिंश शासकों ने उस दौर में भी संचार नेटवर्क के जरिए आम लोगों को संभावित खतरे से बचाने के लिए सूचना तंत्र को सुदृढ़ कर लिया था। इससे असंख्य जाने बच निकली थी।
वर्ष 1970 की बेलाकुची की बाढ़ ने भारी तबाही मचा दी थी। इसके चलते अलकनंदा के तटवर्ती क्षेत्रों को भारी नुकसान पहुंचा था। इसके चलते हेंलग से लेकर पांखी तक सड़क भी तहस-नहस हो गई थी। अलकनंदा के तटवर्ती इलाके पर बसा चमोली कस्बा भी आपदा की भेट़ चढ़ गया था। इसके चलते ही चमोली जिला मुख्यालय को गोपेश्वर शिफ्ट कर दिया गया। अलकनंदा, मंदाकिनी, पिडंर और भागीरथी नदियां भी समय-समय पर विकराल रूप धारण करती रही हैं। कुमांऊ की नदियां भी इसी तरह बर्बादी लाती रही है। सतपुली की बाढ़ किसी से छिपी नहीं है।
वर्ष 2013 में केदारनाथ की हिमस्खलन की घटना में हजारों जिंदगियां मलवे में तब्दील हुई। इसके चलते केदारनाथ पुरी तो बर्बाद हुई ही अपितु मंदाकिनी नदी में जलप्रलय के चलते ऊखीमठ और अगस्त्यमुनि ब्लॉकों के तटवर्ती इलाकों को बर्बादी के कगार पर ला खड़ा कर दिया था। इसके चलते इसका असर रुद्रप्रयाग से लेकर ऋषिकेश तक पड़ा था।
बदरीनाथ घाटी में इसी अवधि में लामबगड़ से लेकर रुद्रप्रयाग तक भारी तबाही सामने आई थी। पिंडर नदी में भी इसी दौर में जलप्रलय के चलते पैदल और मोटर पुल भी आपदा की भेंट चढ़ गए थे। पिंडर नदी के तटवर्ती क्षेत्रों में रह रही आबादी को भारी नुकसान उठाना पड़ा था। इस आपदा ने लोगों को इस कदर दहशत में डाला कि ज्यादातर लोगों ने पहाड़ों से ही सुरक्षित भविष्य को लेकर पलायन करना शुरू कर दिया।
वर्ष 2021 की 7 फरवरी को रैंणी के ऊपरी क्षेत्र में हिमस्खलन से चिपकों की धरती रैंणी पर विनाश का कहर टूट पड़ा। इसके चलते रैंणी में ही एक जलविद्युत परियोजना में काम कर रहे डेढ़ दर्जन से अधिक लोग अकाल मौत के शिकार हुए। इसी आपदा के जलजले ने तपोवन में बन रही तपोवन-विष्णुगाड़ जलविद्युत परियोजना को भी अपने आगोश में लिया। इसके चलते पानी का सैलाब परियोजना की टनल में जा घुसा। इस आपदा में कुल 200 से अधिक लोग अकाल मौत के शिकार हुए।
इसके अलावा धौलीगंगा के तटवर्ती क्षेत्रों में भी पैदल पुल आपदा की भेट़ चढे़। एक दौर में आपदा की दृष्टि से बेहद शांत माने जाने वाली धौलीगंगा के विकराल रूप ने जनजीवन को तबाह कर रख दिया। गनीमत यह रही कि रैंणी से पानी का सैलाब गमशाली की ओर भी मुड़ गया। यदि ऐसा नहीं होता तो यह आपदा अलकनंदा के तटवर्ती क्षेत्रों में कहर बरपती। आज भी लोग शीतकाल की इस आपदा को लेकर सिहर उठते हैं।
पिछले साल धराली और थराली की आपदा की घटनाओं ने भी लोगों को मौत के मुंह में धकेल दिया। इसके चलते पिंडर नदी ने फिर उत्पात मचाया। पिछले साल की आपदा की घटना को याद कर लोग सहम जाते है।
वैसे भी हिमालय को एशिया का वाटर टैंक कहा जाता है। हिमालय में पानी ग्लेशियर के रूप में जमा होने के चलते ग्लेशियरों के टूटने की घटनाएं हिमालयी क्षेत्र में आम हो जाती है। मौसमीय चक्र में आ रहे बदलावों के चलते हिमालय के ग्लेशियर लगातार पिघलते जा रहे हैं। पहले की तुलना में ग्लेशियरों का दायरा भी सिकुडता जा रहा है। हिमालय हालांकि लागातार इस तरह की घटनाओं के चलते चेतावनियां दे रहा है। इसके बावजूद लगातार हो रहे जलवायु परिवर्तन से निपटने की दिशा में आम लोगों की ओर से कोई पहल होती नहीं दिखाई दे रही है।
यह भविष्य के लिए खतरे की घंटी तो है किन्तु इससे निपटने के लिए सामुहिक प्रयासों की दरकार भी है। जल विद्युत परियोजनाओं के निर्माण, तीर्थाटन और पर्यटन और सड़कों के विस्तार के कारण अनिय़त्रिंत विकास की होड़ में हिमालय आपदाओं का घर बनता जा रहा है।
आपदा प्रबंधन को ठोस नीति की दरकार
एचएनबी गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के भू-विज्ञान के विभागाध्यक्ष एमपीएस बिष्ट के अनुसार हिमालय में इस तरह के जलजले लगातार चेतावनी देते आ रहे है। इसके बावजूद लोग संभलने को तैयार ही नहीं है। उन्होंने कहा कि गौणाताल फटने से 1894 की घटना को देखते हुए भी लोग संभले नहीं संभल रहे है। 1970 की बेलाकुंची की अलकनंदा बाढ़ और 2013 की केदारनाथ की हिमस्खलन की विनाशलीला से भी लोगों को संभलना होगा।
उनका कहना है कि आपदा के लिए अर्ली अलर्ट सिस्टम को मजबूत करना होगा। इसके अलावा नदियों के तटवर्ती क्षेत्रों के बसागत के लिए एक निश्चित मानक तैयार कर ही इस तरह के जलजले से निजात मिल सकती है। नदियों के तटवर्ती क्षेत्रों में सरकार को मानक तैयार कर इसका उंल्लघन करने वालों के प्रति शक्ति दिखानी होगी।
उत्तराखंड के संदर्भ में उनका कहना है कि यहां नदियों के किनारे बसी आबादी सुरक्षित नहीं है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि राज्य निर्माण के बाद आपदा प्रबंधन की नीति तैयार कर ही आपदाओं से निजात मिल सकती है। ऐसा नहीं किया गया तो नेपाल की तरह उत्तराखंड हिमालय के लिए खतरे टले नहीं हैं।
रिपोर्ट- वरिष्ठ पत्रकार रजपाल बिष्ट



