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बागवानी में सुरेंद्र और मंगल सिंह ने दिखाई नई राह

पौड़ी, 15 जुलाई। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में पारंपरिक खेती से इतर अब बागवानी भी आत्मनिर्भरता की पहचान बन रही है। जनपद के सीमांत बीरोंखाल विकासखंड का जमरिया गांव आज इस बदलाव का उदाहरण बनकर सामने आया है। दो प्रगतिशील किसानों सुरेंद्र सिंह रावत और मंगल सिंह चौधरी ने आधुनिक सेब बागवानी को अपनाकर न केवल खुद को आत्मनिर्भर बनाया है, बल्कि पलायन की मार झेल रहे पहाड़ के युवाओं को स्वरोजगार की एक नई राह भी दिखाई है।

सालाना 4 से 5 लाख का शुद्ध मुनाफा
किसान सुरेंद्र सिंह रावत ने वर्ष 2021 में इस सफर की शुरुआत की थी। आज उनकी 80 नाली भूमि पर करीब 1500 फलदार सेब के पेड़ लहलहा रहे हैं। उद्यान विभाग की मदद से ट्रैक्टर और पॉलीहाउस जैसी वैज्ञानिक सुविधाएं पाकर वे सेब के साथ-साथ मौसमी सब्जियां, मत्स्य पालन और बकरी पालन भी कर रहे हैं। इससे उन्हें सालाना 4 से 5 लाख रुपये का शुद्ध लाभ हो रहा है।

इसी तरह, मंगल सिंह चौधरी भी अपने बगीचे में 1500 फलदार सेब के पेड़ों और 500 नए पौधों के साथ हर साल 4 से 5 लाख रुपये का मुनाफा कमा रहे हैं। उन्नत कृषि प्रशिक्षणों का हिस्सा बनकर मंगल सिंह न सिर्फ अपने उत्पादों को राज्य की बड़ी मंडियों तक पहुंचा रहे हैं, बल्कि अन्य ग्रामीणों को भी इस तकनीक से जोड़ रहे हैं।

विभागीय सहयोग और वैज्ञानिक सोच का असर
जिला उद्यान अधिकारी मनोरंजन सिंह भंडारी बताते हैं कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में विभाग किसानों को उच्च गुणवत्ता के पौधे, तकनीकी सहायता और प्रशिक्षण दे रहा है। जमरिया गांव के ये किसान साबित करते हैं कि यदि वैज्ञानिक पद्धति और सरकारी योजनाओं का सही तालमेल हो, तो पहाड़ की मिट्टी भी सोना उगल सकती है। इससे साबित है कि अब पहाड़ की खेती सिर्फ गुजर-बसर नहीं, बल्कि मजबूत आमदनी का जरिया भी बन रही है।

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