साहित्य
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गज़ल (गढ़वाली)
दुन्यांदरि को म्वाल भौ बिंगणि रैंद जिंदगि । कभि मैंगी कभि सस्ति बिकणि रैंद जिंदगि ।। उत्यड़ौ फर उत्यड़ा अर…
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क्या कहें? (हिन्दी कविता)
ये दौर हैंजब आप किसीसुबह को ढलती रात के साए की तरह देखते हैंउजली सी रात सेविदा लेते हुए पल…
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बता दियां भारै मिथै भी?
• केशव डुबर्याळ “मैती“मुंड मलासणौ,सबी तैयार छन,पर कै थै असप्ताळम,मुंडरा गोळी भी मील होली,बता दियां भारे मिथै भी?वन त समाजसेवी,बिंडी…
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लिंगुड़ बेचते लड़कों!
• अनिल कार्कीओ लिंगुड़ बेचते लड़कोंहरे रहनाथोड़ा नरम भीआदम फर्न की कोपलों साजब तुम दुनिया के बारे में जानोगे तुम्हें…
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