
Smriti Shesh : मैंने सैनिकों के जीवन को बहुत करीब से देखा है। सोफिया कांड के बाद श्रीनगर में सैनिकों का जीवन देखा, बारालाचा ला पास, द्रास-कारगिल, लेह, लद्दाख, चांगला ग्लेशियर तथा पेंगोंग झील की यात्राओं के दौरान उनके संघर्षपूर्ण जीवन को निकट से समझने का अवसर मिला। तब सैनिकों के प्रति मेरे मन में आदर, सम्मान, प्रेम-स्नेह और श्रद्धा का ऐसा ज्वार उमड़ पड़ा, जिसे शब्दों में व्यक्त करना कठिन है।
राजस्थान के थार रेगिस्तान के निकट यात्रा के दौरान एक अधिकारी ने बताया था कृ “माथे पर हाथ फेरो तो हाथ में रेत आ जाती है, खाने की थाली में भी रेत के दर्शन होते हैं।” पचास डिग्री सेल्सियस तापमान में बाहर निकलकर पेट्रोलिंग करना कितना कठिन होता होगा, इसकी कल्पना ही की जा सकती है। हम प्रायः सोचते हैं कि मेजर या जनरल जैसे उच्च पदों पर बैठे अधिकारी अत्यंत आरामदायक जीवन जीते होंगे, परंतु कोई भी व्यक्ति इन पदों तक बिना कठोर संघर्ष और कठिन प्रशिक्षण के नहीं पहुंच सकता। सेना में उच्च पदों तक पहुंचने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति, साहस और कठिन परिस्थितियों में जीने का जज़्बा आवश्यक होता है।
प्रकृति का एक अटूट सिद्धांत है कि जो जितना गहरा और दूर होता है, वह उतना ही शांत और सुंदर होता है। सागर जितना तट से दूर होता जाता है, उतना ही गहरा और शांत हो जाता है। वह अपने भीतर बहुमूल्य खजाना समेटे रहता है। उसी प्रकार अच्छे मनुष्य का व्यक्तित्व भी गंभीर, शांत और विशाल होता है। ऐसे ही धीर-गंभीर व्यक्तित्व के धनी थे मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूरी।
मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूरी का जन्म 13 अक्टूबर 1934 को देहरादून में हुआ। उनके पिता श्री जयबल्लभ खंडूरी प्रसिद्ध पत्रकार थे तथा माता श्रीमती दुर्गा देवी लोकप्रिय नेता हेमवती नंदन बहुगुणा की बहन थीं। उनका पैतृक निवास पौड़ी गढ़वाल में था। 17 फरवरी 1964 को उनका विवाह शकुंतला नेहवाल (अरुणा खंडूरी) से हुआ।
छात्र जीवन से ही उनमें राष्ट्र सेवा की भावना थी। अध्ययन के दौरान उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में भी अपनी सहभागिता निभाई। उन्होंने इंटरमीडिएट की परीक्षा पौड़ी से उत्तीर्ण की। सन 1954 में वे भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट के रूप में नियुक्त हुए और 1954 से 1990 तक भारतीय सेना की कोर ऑफ इंजीनियर्स में अपनी उत्कृष्ट सेवाएं दीं।
उनकी शिक्षा के प्रति गहरी रुचि और समर्पण आश्चर्यचकित करता है। उन्होंने बी.एससी., बी.ई. तथा एम.आई.ई. की शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद कॉलेज ऑफ मिलिट्री इंजीनियरिंग, पुणे से रक्षा प्रबंधन में स्नातकोत्तर उपाधि अर्जित की। साथ ही उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियर्स, नई दिल्ली तथा इंस्टीट्यूट ऑफ डिफेंस मैनेजमेंट, सिकंदराबाद से भी विभिन्न अध्ययन और प्रशिक्षण प्राप्त किए।
सेना में उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान उन्होंने रेजिमेंट कमांडर के रूप में अपनी भूमिका निभाई। इसके अतिरिक्त वे मुख्य इंजीनियर, इंजीनियर ब्रिगेड के कमांडर, सैन्य सचिव तथा सेना मुख्यालय में महानिदेशक जैसे महत्वपूर्ण पदों पर भी कार्यरत रहे।
वर्ष 1982 में उन्हें राष्ट्रपति द्वारा अति विशिष्ट सेवा मेडल से सम्मानित किया गया। सेवानिवृत्ति के पश्चात 1990 में उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया। वर्ष 1991 में वे पहली बार गढ़वाल लोकसभा सीट से सांसद चुने गए। 1992 से 1997 तक वे उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के उपाध्यक्ष रहे। बाद में वे पांच बार गढ़वाल क्षेत्र से लोकसभा सदस्य चुने गए।
वर्ष 2000 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में उन्हें भूतल परिवहन मंत्री का दायित्व सौंपा गया। 2007 से 2009 तथा 2011 से 2012 तक वे दो बार उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने। उनके कार्यकाल में चिकित्सा और शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य हुए। अस्पतालों का आधुनिकीकरण, दवाओं की उपलब्धता, 108 एम्बुलेंस सेवा की शुरुआत, श्रीनगर मेडिकल कॉलेज की स्थापना तथा अल्मोड़ा मेडिकल कॉलेज की आधारशिला जैसे महत्वपूर्ण कार्य उनके प्रयासों का परिणाम थे।
शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने अनेक युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराया। छात्राओं को छात्रवृत्तियां प्रदान की गईं, महिलाओं को पंचायतों में आरक्षण दिया गया तथा विधवाओं, दिव्यांगों और वृद्धजनों के लिए पेंशन योजनाओं का विस्तार किया गया। भूमि सुधार संबंधी अध्यादेश उत्तराखंड के इतिहास में उनके सबसे महत्वपूर्ण कार्यों में से एक माना जा सकता है। यदि यह कानून न बना होता तो संभवतः भूमि माफिया उत्तराखंड की बड़ी भूमि पर कब्जा कर चुके होते।
उनके प्रयासों से मनेरी भाली परियोजना, टिहरी परियोजना, लाता तपोवन परियोजना, व्यासी परियोजना तथा अन्य विद्युत परियोजनाओं पर तीव्र गति से कार्य प्रारंभ हुआ। जनता ने उनके कार्यों और ईमानदार छवि को देखकर उन्हें उस समय “देश का सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री” भी चुना था।
भ्रष्टाचार के विरुद्ध उनकी नीति स्पष्ट और कठोर थी। उनके कार्यकाल में उनके ऊपर या उनके संरक्षण में किसी प्रकार के भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगा। सिद्धांतों और आदर्शों से समझौता न करने के कारण उन्हें अपनी ही पार्टी के लोगों के विरोध का सामना भी करना पड़ा। उन पर ये पंक्तियां अत्यंत सटीक बैठती हैं-
“लोग गैरों की बात करते हैं, हमने अपने भी आज़माए हैं,
लोग कांटों से बचकर चलते हैं, हमने फूलों से ज़ख्म खाए हैं।“
एक सच्चे, ईमानदार और आदर्शवादी नेता के लिए लोभ और स्वार्थ से दूर रहना आवश्यक होता है। मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूरी में ये सभी गुण विद्यमान थे। उनका शांत, गंभीर और संयमित व्यक्तित्व उन्हें अन्य नेताओं से अलग पहचान देता था।
आज जब उनके जीवन और कार्यों का अध्ययन किया जाता है तो यह प्रश्न अवश्य उठता है कि क्या केवल सरकार के ही कर्तव्य होते हैं? क्या जनता के केवल अधिकार होते हैं? अधिकारों के साथ कर्तव्य भी समान रूप से आवश्यक हैं। मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूरी अपने दायित्वों के निर्वहन में पूर्णतः समर्पित रहे। उनकी ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा और राष्ट्रसेवा की भावना सदैव स्मरणीय रहेगी। मां भारती के इस दिवंगत सपूत को विनम्र श्रद्धांजलि एवं शत-शत नमन।



