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Latest News: सियासी दलों को ‘किशोर उपाध्याय’ की क्या है यह खास सलाह

उत्तराखंड कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय पिछले काफी वक्त से राजनीति के साथ ही सामाजिक मुद्दों पर भी लगातार सक्रिय हैं। एक संदेवनशील चिंतक के तौर पर वे समय- समय पर अपनी सलाहों को सार्वजनिक करते रहते हैं। जिनमें वह जनहितों के मद्देनजर कई बार अपनों का विरोध करने तक से नहीं हिचकते।

इसबार जब उत्तराखंड समेत पांच राज्यों में चुनाव का ऐलान हो चुका है। उससे एक दिन पहले किशार उपाध्याय ने देश और राज्य में फैलते कोरोना संक्रमण के बीच चुनावों में राजनीतिक दलों को कार्यकर्ताओं के प्रति न सिर्फ उनकी जिम्मेदारी याद दिलाई है, बल्कि एक सलाह भी दी है। जो कि कार्यकर्ताओं के हितों के दृष्टिगत उल्लेखनीय कही जाएगी। वह सरकार को भी सलाह देते हैं, जो कि सरकारी कर्मचारियों आदि के बारे में है।

बकौल किशोर उपाध्याय- चुनाव के दौरान कोरोना से बचाव के लिए, संक्रमित होने पर इलाज के लिऐ और मृत्यु होने पर परिवार की आर्थिक सुरक्षा के बारे में राजनैतिक दल और सरकार अपनी नीति, कार्ययोजना और सोच स्पष्ट करें।

राज्य में कोरोना की गम्भीर स्थिति को देखते हुए विधानसभा चुनावों के दौरान राज्य की जनता और राजनैतिक दलों के कार्यकर्त्ताओं की जीवन की सुरक्षा के बारे में नीति स्पष्ट करने का मैंने आग्रह किया है। चुनाव परिणाम के बाद जीतने वाला विधायक, मन्त्री आदि बनेगा। हारने वाला अपने ज़ख्म सहलाएगा। लेकिन, इस प्रक्रिया में अगर जनता और राजनैतिक दलों के कार्यकर्त्ता संक्रमित होते हैं तो राजनैतिक दल उन्हें कैसे भरोसा दिलाने जा रहे हैं कि वे उनके व उनके परिवार के हितों की सुरक्षा करेंगे।

चुनाव में लगे सरकारी कर्मचारियों, ग़ैर सरकारी लोगों के बारे में भी सरकार की नीति स्पष्ट होनी चाहिए। राजनैतिक दल बीमा एजेंसियों के साथ बात कर अपने कार्यकर्त्ताओं का कम से कम 50 लाख रुपये का बीमा करवाएं और भविष्य में परिवार के आर्थिक सुरक्षा की गारंटी लें।

ग्राम पंचायतों, क्षेत्र पंचायतों, ज़िला पंचायतों, नगर निकायों को विश्वास में लेकर राज्य में उपलब्ध मेडिकल, पैरा-मेडिकल और स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम कर रहे मानव संसाधन को अभी से बचाव कार्य हेतु इंगेज किया जाए। ग्राम पंचायत स्तर पर दवाईयों, ऑक्सिजन और प्राथमिक उपचार और चिकित्सीय परामर्श की व्यवस्था की जाए।

पूरा प्रदेश इस दौरान शीतलहर की चपेट में होता है, पर्वतीय क्षेत्र में तो स्थिति और भी विकट होती है, उससे चुनाव प्रक्रिया में लगे सरकारी व ग़ैर सरकारी मानव संसाधन का कैसे बचाव किया जा सकता है? राजनैतिक दलों व सरकार को जनता और विशेषकर मतदाता को उनके जीवन की सुरक्षा का भरोसा दिलाना समय की आवश्यकता है। राजनैतिक दलों के राष्ट्रीय नेताओं ने अपने कार्यक्रम जनसभाएं आदि स्थगित कर दी हैं, लेकिन राज्य में अभी भी लोग सचेत नहीं हैं। ज़रूर सोचें, “जान है, तो, जहान है”।

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