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भाबर नि जौंलाः पहाड़ की पीड़ा को स्वर देता नरेंद्र सिंह नेगी का यह गीत

रिलीज के महज तीन दिनों में लाखों प्रशंसकों ने लिया इसे हाथो-हाथ

Review : देहरादून (दिनेश शास्त्री)। उत्तराखंड के लोकजीवन को वाणी और पहचान दिलाने वाले प्रख्यात कवि और लोक गायिकी के शिखर पुरुष नरेंद्र सिंह नेगी ने तीन दिन पूर्व जारी नए गीत “भाबर नि जौंला“ को उनके प्रशंसकों ने हाथोंहाथ लिया है। यह गीत पहाड़ की पीड़ा को स्वर देता है, साथ ही अतीत का एक दस्तावेज भी है। दो-तीन पीढ़ी पहले तक की पहाड़ के लोकजीवन की परिस्थितियों का यह सजीव चित्रण पूर्वजों के जीवन संघर्ष और अपनी मिट्टी से जुड़े रहने के आग्रह का द्वंद इस गीत में बखूबी दर्शाया गया है। जड़ों से जुड़े रहने के साथ ही जीविका के लिए संसाधनों को जुटाने की जरूरत के मद्देनजर मौसमी पलायन की मजबूरी को रेखांकित करता ये गीत कई अर्थों में नेगी जी के सृजन संसार का नायाब पुष्प है।

जैसा कि गीत के शीर्षक से ही स्पष्ट हो जाता है, नायक सर्दियों में पहाड़ में पड़ रही ठंड से बचने और आजीविका के लिए संसाधन जुटाने के लिए चार छह माह भाबर चलने का सुझाव देता है, लेकिन नायिका अपनी जड़ों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। नायक कहता है- यहां पहाड़ में ठंड ज्यादा पड़ रही है, लिहाजा कुछ दिन के लिए भाबर चलते हैं, तो जवाब में नायिका कहती है कि तुम्हारी माया में सर्दी (ह्युंद) की क्या उम्र है, भाबर नहीं जाते हैं। यहीं घी से चुपड़ी रोटी खिलाऊंगी, माया के छोंक से सना साग खिलाऊंगी, माया की बातें ओढेंगे, बिछाएंगे, फिर ठंड की क्या बिसात है, लिहाजा भाबर नहीं जाएंगे।

इस पर नायक उलाहना के अंदाज में कहता है कि तेरी चिकनी चुपड़ी बातों से पेट नहीं भर सकता, माया की माला जप कर जिंदगी नहीं काटी जा सकती। भाबर जाएंगे तो वहां कुछ रोजगार तलाशेंगे, कुछ कमा कर लाएंगे, इस पर नायिका कहती है कि यहीं पहाड़ में रह कर खेती बाड़ी करेंगे, सब्जी उगा कर बाजार में बेचेंगे, गाय-भैंस पाल कर घी दूध का कारोबार करेंगे, उस भाबर में क्या रखा है, यहीं कुछ उद्यम करके अपनी जीविका चलाएंगे।

इसी तरह के मनोभावों को गीत में पिरो कर नेगी ने अपने लोक को एक महत्वपूर्ण संदेश देने का स्तुत्य प्रयास किया है। भावभूमि की दृष्टि से गीत निसंदेह उत्कृष्ट बना है और इसी कारण लोगों की जुबान पर चढ़ रहा है। गीत के वीडियो फिल्मांकन में शैलेंद्र पटवाल और अंजली नेगी ने शानदार काम किया है। यह गीत हमें कमोबेश आजादी से पूर्व के कालखंड अथवा लगभग उसी दौर के अभावग्रस्त समाज की जिंदगी को संवारने की जद्दोजहद के दर्शन कराता है।

टिहरी जिले कुंजणी पट्टी के कोटी गांव में फिल्माया गया ये गीत हमारे अतीत, भूगोल, रहन सहन, खानपान और संस्कृति का आईना सा है। गीत संगीत के साधक नरेंद्र सिंह नेगी के साथ प्रतिक्षा बमराड़ा ने स्वर दिया है। प्रतिक्षा काफी लम्बे समय से लोकगायन से जुड़ी हैं और इस गीत के जरिए उसने अपनी प्रतिभा एक बार फिर सिद्ध की है। फिल्मांकन का निर्देशन कविलास नेगी ने बेहतर ढंग से किया है जबकि संगीत संयोजन विनोद चौहान ने किया है।

गीत की लोकप्रियता का आलम यह है कि बीते शनिवार को इसके जारी होते ही पहले ही घंटे में पांच हजार लोगों ने यूट्यूब पर इसे देख लिया था। पिछले मात्र तीन दिन में विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर करीब डेढ़ लाख लोग इस गीत को देख चुके हैं तो इसी बात से इसकी लोकप्रियता को आंका जा सकता है। गीत का वीडियो संपादन गोविंद नेगी ने किया है। संपादन की एकाध जल्दबाजी को छोड़ दिया जाए तो काम शानदार किया है। मंगरे से पानी लाती नायिका को बहुत जल्दबाजी में चलते दिखाया गया है जबकि गीत का मिजाज इससे हट कर है। कुल मिलाकर भाबर नि जौंला गीत बेहद उम्दा है और अरसे तक याद रखा जाएगा।

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