गढ़वालीसाहित्य

गढ़वाली कहानीः रकी-मुकी द्वी बोड़

- गिरधारी रावत

Garhwali Story : बात उत्तराखंड मा बस्यां एक छुट्टा सि गौं की चा। उं दिन पुंगड़ों मा ग्यूं-जौ कटेगे छा, अर गौं का लोग अपड़ा गोर-बछरूं तैं चरोणू तैं पुंगड़ों मा छोड़ जांदा छा। चरदी-चरदी गोर बछरू काफी दूर तक पौंछी जांदा छा त उं मदी द्वी बोड़ अलग-अलग मौ का बि चनू तैं आंदा छया अर चौर-चारी श्याम बक्तों अपणा घौर-गुठ्यार पौंछी जांदा छया। इनी रोज पुंगड़ों मा आंदा-जांदा अर मिलुण-जुलण से उं द्वी बोड़ों मा दोस्ती ह्वेग्या।

गौं को एक दबंग किस्मों को एक आदिम जैको नौ चुफासिंग छयो वेतैं जखमा फैदा दिखेंदो छयो बस झट खती वांका पिछने पुड़ी जांदू छयो। चुफासिंग बखरा-ढिबरा से लेकी छुट्टा-छुट्टा ठिकदरी काम बि करदु छयो। एक दिन वेकी नजर पुंगड़ों मा चरदा उं द्वी बोड़ों पर जन पोड़ी बस वु उबरी वीं मवा का घौर पौंछी ग्याया अर गळदम-सळदम मोल-तोल कैरी की उं द्वी बोड़ों तैंगी अपणा कीला पर बांदी ग्याया। अब जोच दिन हफ्ता बीती गैनी चुफासिंग उं बोड़ों तै तड़तड़ा घाम मा, सटै सुटै की जुतण बैठी ग्या अर हौळ परो तैं तैयार कन बैठ ग्या। वु द्वी बोड़ चुफासिंग देखी भिजाम डरदा छाया कलै कि चुफासिंग ऊंतै खूब हड़कांदू छयो। अब चुफासिंग उं बोड़ों की खूब खुराक पाणी बि कन बैठ ग्या। रकी-मुकी नौं का द्वी बोड़ चुफासिंग घौर मा खूब कळ्च-पळ्च अर पींडो पाणी खैकी अब उं पर खूब बनी आण बैठी ग्याया। मुकी त अब खूब तगड़ो ह्वे ग्या अर अब वो शैतानी बि कन बैठी ग्यायी, अर दगड़ी मा रैण से आपस मा लड़ै बि कन बैठी जांद। मुकी त इथगा चालाक ह्वे ग्या कि जोर जबरदस्ती रकी बांठा बि खा देंद छयो अर हौळ लगौण बक्तों मोण-धौण तोड़ी बाना बना देंद छयो, ज्यां सि रकी यीं खींचा ताणी मा परेशान ह्वे जांद छयो, पर मुकी की हरकतों ल रकी बचपनो दगड़ो याद कैरी तैं कुछ बि नि बुल्द छयो अर अफी-अफी घुटेणू रैंद छयो। अब ऊंका बीच आपस मा ठिसमिसाट बि होण बैठी ग्याया। मुकी बि अब रकी की परबा नि कैरी कि अफी-अफी अलग-थलग चनू तैं चली जांदू छयो।

एक दिन जब पुंगड़ों मा खार्यूं गोर चरणा छा त रकी बि इकडंबा एक जगा मा चरणूं छौ तबर्यूं अचणचक सारी का गोरों ल जि चितै हो अर वो सबी गोर दौड़ी-दौड़ी रकी जनै आण बैठी गैनी, रकी ला जाणी कि सबी मेरी तरपां आणा छन त रकी बि डौरा बाना हड़बड़ाट मा भगण बैठी ग्यायी, अर भगदी-भगदी रकी खुटों का अळजाट मा मुल्या पुंगड़ा पोड़ी लमडी ग्या।

ब्यखनू दां सब गोर अपणा-अपणा कीला पर पौछीं गैनी, अर मुकी बि अपणा घौर-गुठ्यार पौंछी ग्या। ब्यखनू दां जब काफी टैम ह्वे ग्या त चुफासिंग तैं फिकर ह्वे ग्या कि रकी अज्यूं तैं घौर किले नि आ वु लालटेन लेकी खुज्यौणू तैं सारी जनै चली ग्या खुज्योंदी-खुज्योंदी काफी देर बाद जब चुफासिंग तैं रकी एक पुंगड़ा मा अचेत पुड्यूं मिले त वु ख्यस रै ग्या। चुफासिंग वेका समणी ग्याया अर काफी झकोळी-झकाळी, हरकै-फरके पर क्वी फरक नि चितै, सैद च कि रकी पर बिंडी चोट लगीं छै ज्यांसि वु नि उठी सकणू रा। चुफासिंग झट खती घौर ग्या वेतैं घास-पाणी अर एक बुर्या लेकी आ ग्या। चुफासिंग ल वेतैं कथगा खलोणे कोशिश कारी पर मजाल च कि वेल कुछ खै हो। अंधेरो बि काफी ह्वे गे छौ चुफासिंग ल वेका पीठ मा बुर्या डाळी द्या अर मलासी-मुलासी की वेतैं भोळ सुबेर आणो इशारा कैरी की सीदा घौर आ ग्या।

इनै मुकी तैं रकी का नि आण से अच्छू नि लगणू रा। रात भर मुकी की रमा-रौड़ी लगीं रा, जरासि बि छिड़बड़ाट मा झट खती कंदूड़ खड़ा करी देणू रा, वैतें त पता नि छौ कि, कि ह्वा, किले कि वु दगड़ा-दगड़ी चरदा बि नि छाया। भुळका सुबेर जनि रात खुली त मुकी की कीला पर रिटा-रीटी लगीं रा, अर जन चरणू तैं छोड़ी ता वु रकी तैं खुज्योणू इनै-उनै दौण बैठि ग्या, त देखी कि रकी बिलकुल बेहोश पुड़्यूं चा, उ वेका समणी जैते वे तैं सुंगण बैठी ग्या, कबि रमण बैठी जांद, त कबि वेका चौ तरफां घुमण बैठी जांद। तबर्यूं चुफासिंग बि घास पाणी ले तैं और डौक्टर मंगे दवै लेकी आ जांद, अर रकी तैं मलासी तैं पाणी पिलाणे, अर दवै खलाणे कोशिश करदु पर वु गुमसुम चोटा ल इथगा तड़पणू रैंद कि न वैसी खयेदूं च न पियेदूं चा। चुफासिंग तैं बि अब वैकी जीणे उम्मीद कम रै ग्या अर घास पाणी वेका मुख समणी धारी की घौर वापस आ ग्यअब मुकी वेका समणी जातें लेटिग्या, बिचरो रकी वे जने टकटकी आंख्यूं ल दिखण बैठी जांद. रकी का आंख्यूं मा आंसू आणा छा, सैद च कि वेतैं बचपन मंगे पुंगड़्यूं मा चरद दां की याद आणी रै हो। आज जु लड़खू मुकी वे दगड़ हर बक्तों लड़ै झगड़ा कनू रैंद छयो, सैरा दिन भर वेका समणी बैठ्यूं रा, न वेला वेका बांठां घास पाणी खाया प्याया अर न अफू चरणू तैं ग्याया।

अब जब चुफासिंग ब्यखनू दां फिर रकी तैं दिखणूं तैं आ त देखी कि मुकी रकी का समणी बैठ्यूं चा, झगड़ालू मुकी तैं रकी का समणी बैठी देखी चुफासिंगा मन मा यु सीन देखी मन मा प्रेम कु भाव घर बैठीग्या। चुफासिंग राकी तैं मलासी की मुकी तैं अफ दगड़ घौर लिजाण लगी त मुकी घौर जाणू तैयार नि ह्वा, जमा नि उठी। बड़ी मुश्किल से चुफासिंगा ल जोर जबरदस्ती कै की मुकी तैं उठाळे,जनी मुकी उठे रकी, मुकी तैं टक-टकी आंख्यूं ल दिखण बैठी ग्या, मुकी ल जनी देखी मुकी जोर-जोर से रमण बैठी ग्या। मुकी जन घौर जाणू तैं पैटी तबर्यूं रकी की मोण झट खती लुथमुड़ी ह्वेग्या। अब मुकी तैं एसास ह्वे गे की रकी यीं दुन्यां मा नि रंयूं । मुकी बड़ी मुश्किल से घौर पौंछे, सैरी रात से नि साकी, जै दगड़ वु लड़ै-झगड़ा कन पर लग्यूं रैंद छयो आज वेका बिना वेतैं सुनसान लगणूं छयो, मुकी सुचण बैठी जांद कि यो सब मेरी वजे सि ह्वाया, अगर मि लड़ै-झगड़ा नि करदू त हम दगड़ै चरणा रैंदा, अर आज इन नि होंदू. अब मुकी तैं रकी की याद आण बैठी गे। वेतैं अब यखुली-यखुली मैसूस बि होणू चा।

आज कीला पर बंध्यूं मुकी यखुली-यखुली जुगाळी कनू चा, सुचणू रैंद कि मिली-जुली तैं रैण मा ही जीवन कु सबसे बड़ो सुख चा।

दिन, हफ्ता, मैना बीती गैनी पर अज्यूं तैं रकी, मुकी की आंख्यूं मा रिटणू लग्यूं रैंद। आज जब बि मुकी चरणूं तैं वूं पुंगड़्यूं जनै जांद त जोर-जोर से रमण बैठी जांद। चुफासिंग तैं बि अब मुकी तैं यखुली-यखुली दिखण अच्छो नि लगणू चा, इलै अब चुफासिंग मुकी तैं एक नयो दगड़्या लेकी आग्या। अब द्विया द्वी अच्छी तरौं सि रैण बैठी जंदन, हमेशा चनू तैं दगड़ी जंदन, मुकी बि अब नया दगड़्या तैं खूब मण बैठी जांद अर दगड़ा रैकी रूमुक पुण सि पैली द्विया द्वी अपणा कीला पर ए जंदन।

द्वन्द्व, द्वेष की भावना, कटु वचन, झूठ और गलत आचार-बिचार तकरीबन सबी प्राण्यूं मा कुछ न कुछ होंदू चा लेकिन मनुष्य सबी प्राण्यूं मा अग्रणी मणे जांद पर सबसे जादा गळ्थी वी करदु।

एकडबां खुंटी मा बैठ्यूं चुफासिंग वूं द्वी बोड़ों तैं दगड़ा-दगड़ी घास-पात खांद दिखद अर तमखू सोड़ मारी सुचद कि आज मुकी का ब्यवहार मा इथगा बदलाव ए ग्याया, अर अपणा रूखा ब्यवहार से बि अफुतैं बुथ्योणे अर समझौणे की कोशिश करद कि जब गोर-बछरू जन सबी प्राणी अच्छू-भलू समजणे की समज रखदन त हम मनिख्यूं मा बि इन समज होण चैंद ज्यांसि जीवन जीण सब्यूं तैं सरल ह्वे जौ।

कहानी साभार- भीष्म कुकरेती

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