
देहरादून (जगमोहन रौतेला), 23 जुलाई। मैती आंदोलन के प्रणेता डॉ. कल्याण सिंह रावत ‘मैती’ (Dr. Kalyan Singh Rawat ‘Maiti’) कहा कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं का विषय नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की नैतिक जिम्मेदारी है।
बुधवार को दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र में “पर्यावरण संरक्षण के अभिनव प्रयोग और अनुभव” विषय पर आयोजित कार्यक्रम में डॉ. रावत ने अपने लगभग चार दशकों के अनुभवों को साझा किया। वर्ष 1995 में आरंभ मैती आंदोलन पर बताया कि विवाह जैसे शुभ अवसर पर पौधारोपण की परंपरा आज एक व्यापक जनआंदोलन बन चुकी है। जो अब देश-विदेश तक फैल चुका है।
उन्होंने चिपको आंदोलन, जैव विविधता संरक्षण, जलस्रोतों के पुनर्जीवन, वन्यजीव संरक्षण और सामुदायिक सहभागिता से जुड़े अनुभवों को भी साझा किया। रानीचौरी (टिहरी) स्थित मैती शोध एवं जैव विविधता वन, विशाल नर्सरी, वृक्षारोपण अभियान, देवभूमि वृक्ष प्रसाद योजना, चाल-खाल पुनर्जीवन, बुग्याल संरक्षण अभियान और पर्यावरण मेलों जैसे नवाचारों की भी जानकारी दी। उन्होंने युवाओं और विद्यालयों के ईको क्लबों की भूमिका को पर्यावरण संरक्षण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बताया।
इससे पूर्व दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के कार्यक्रम अधिकारी चन्द्रशेखर तिवारी ने कहा कि मैती आंदोलन ने पर्यावरण संरक्षण को सामाजिक संस्कार और जनभागीदारी से जोड़कर नई दिशा दी है। वहीं, प्रतिभागियों ने कहा कि जल, जंगल, जमीन और जैव विविधता की रक्षा के लिए जनसहभागिता समय की जरूरत है।
कार्यक्रम का संचालन इतिहासकार डॉ. योगेश धस्माना ने किया। मौके पर पुस्तकालय अध्यक्ष डॉ. डीके पाण्डे, सुंदर सिंह बिष्ट, जगदीश सिंह महर, मदन बिष्ट, शीशपाल गुसाईं, कर्नल डीएस बर्त्वाल, कर्नल डीपी डिमरी, गजेन्द्र रमोला, शांति प्रसाद जिज्ञासु, बीना बेंजवाल, सुरेन्द्र सजवाण, शूरवीर सिंह रावत, आलोक हिमांशु आहूजा, संदीप गुसाईं, कविता बिष्ट, परम जीत सिंह, कल्याण सिंह बुटोला, देवेन्द्र कुमार आदि मौजूद रहे।



