वामपंथी चिंतक डॉ. गिरिधर पंडित का निधन, उत्तराखंड में शोक
शिक्षा और जनआंदोलनों में रहा योगदान, टिहरी जनक्रांति पर प्रामाणिक शोध

देहरादून, 24 अक्टूबर। उत्तराखंड के इतिहासकार, शिक्षाविद् और वामपंथी चिंतक डॉ. गिरिधर पंडित का शनिवार को 82 वर्ष की आयु में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। वे कैंसर की गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे। उनके निधन से राज्य के बौद्धिक, राजनीतिक और सामाजिक हलकों में शोक की लहर है। उनकी अंत्येष्टि रविवार (25 अक्टूबर) को मुनिकीरेती स्थित पूर्णानंद घाट पर होगी।
देवप्रयाग में 9 अप्रैल 1944 को जन्में डॉ. गिरधर पंडित के पिता मुरलीधर शास्त्री संस्कृत के विद्वान और बहुभाषाविद् थे। जबकि चाचा प्रेमलाल वैद्य स्वतंत्रता सेनानी, टिहरी राज्य प्रजामंडल के प्रधानमंत्री और विधायक रहे। परिवार से मिले वैचारिक संस्कारों ने उनके भीतर सामाजिक सरोकारों और राजनीति के प्रति गहरी रुचि पैदा की।
देहरादून के डीएवी कॉलेज और गुरु रामराय कॉलेज से विज्ञान में स्नातक करने के बाद उन्होंने गुजरात में अध्यापन किया। फिर उत्तराखंड लौटकर कुमाऊं विश्वविद्यालय के अल्मोड़ा परिसर से राजनीति विज्ञान में एमए और पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने देवप्रयाग महाविद्यालय का जनसहयोग से संचालन किया, और ओंकारानंद एजुकेशन सोसाइटी के अंतर्गत दस वर्ष तक प्राचार्य के रूप में सेवाएं दीं।
वर्ष 1963 से साम्यवादी विचारधारा से प्रभावित डॉ. पंडित 1969 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के सदस्य बने। उन्होंने पार्टी में छह वर्ष तक सह-राज्य सचिव और छह वर्ष तक राज्य नियंत्रण आयोग के अध्यक्ष की जिम्मेदारी निभाई। उत्तराखंड राज्य आंदोलन में भी वे सक्रिय रहे और देवप्रयाग में आंदोलन का नेतृत्व करते हुए कई बार गिरफ्तार हुए।
वन बचाओ आंदोलन के दौरान उन्हें 99 दिन भूमिगत रहना पड़ा। उन्होंने टिहरी और अल्मोड़ा जेल में भी समय बिताया और उन पर ढाई वर्ष तक मुकदमा चला, जिसमें बाद में वे बरी हो गए। उनके शोध-निर्देशक डॉ. जाकिर हुसैन कहा करते थे, “तुम्हारा एक पैर सड़क पर और दूसरा जेल में रहता है।”
डॉ. पंडित का सबसे उल्लेखनीय योगदान टिहरी रियासत की निरंकुश राजशाही के विरुद्ध हुए जनविद्रोह पर उनका शोध रहा। वर्ष 2023 में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘टिहरी की जनक्रांति’ ने उत्तराखंड के इतिहास के एक महत्त्वपूर्ण अध्याय को समझने में उल्लेखनीय योगदान दिया। इस विषय पर उनका शोध इतिहास के अध्येताओं और पाठकों के लिए महत्त्वपूर्ण दस्तावेज है।
बीमारी और बढ़ती उम्र के बावजूद डॉ. पंडित सोशल मीडिया पर सक्रिय रहे। वे सांप्रदायिकता के खिलाफ बेबाकी से लिखते थे और अपनी कविताएं भी साझा करते थे। कविता-संग्रह प्रकाशित कराने का उनका सपना अधूरा रह गया।
उनका निधन उत्तराखंड के इतिहास-लेखन, शिक्षा जगत और वामपंथी आंदोलन के लिए अपूरणीय क्षति है। उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता, संघर्षशीलता और जनपक्षधरता आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।
नोट – समाचार वरिष्ठ पत्रकार अरविंद शेखर की जानकारी पर आधारित है



