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हिमालयी शृंखलाओं से गुम हुआ इसबार बर्फीला शृंगार

मौसम में आ रहे बदलाव के चलते इस बार हिमालयी चोटियां बर्फ विहीन होकर रह गई है। इसके चलते आम लोगों को भविष्य की चिंता सताने लगी है। दरअसल शीतकाल के इस दौर में अभी तक भी हिमालयी क्षेत्रों में बर्फवारी नहीं हुई है। यहां तक की बारिश भी पूरी तरह से गायब हो चली है। इसके चलते हिमालयी पहाड़ियों पर हिमपात न होने से इस बार हिमालयी चोटियों का बर्फीला शृंगार ही गायब हो चला है। इससे आम लोग मायूस होकर रह गए हैं।

गुजरे 2025 के साल में मौसम लगातार रंग दिखाता रहा। इस दौर में शुरूआत से ही बारिश होती रही। गर्मियों के सीजन में भी लोग वातावरण के गर्म हो जाने से मुश्किल में घिरे रहे। मानसून का दौर आया तो धराली, थराली, नंदानगर और देहरादून में बारिश ने कोहराम मचाया। इसके चलते कई लोग अकाल मौत के शिकार हुए तो वर्षों से खड़ी की गई परिसंपत्तियां भी एक झटके में मलबे में तब्दील हो गई। हालांकि अन्य इलाकों में भी बारिश ने कहर बरपाया।

बारिश का यह दौर जुलाई से लेकर अक्टूबर माह तक चलता रहा। बारिश से लोगों ने किसी तरह निजात पाई तो अक्टूबर के बाद अभी तक मौसम का मिजाज बदला नहीं है। इसके चलते बारिश और बर्फवारी न होने के चलते पहाड़ी चोटियां बर्फ विहीन होकर रह गई है और बारिश की आमद न होने से फसलें भी बुरी तरह प्रभावित होकर रह गई है।

ठंड ने इस तरह कहर बरपा दिया है कि लोगों का जीवन मुश्किलों में घिरता जा रहा है। आम से लेकर खास तक लोग बर्फवारी तथा बारिश न होने के चलते हैरान परेशान होकर रह गए हैं। वैसे समूची दुनिया बीते कई सालों से ग्लोबल वार्मिंग के खतरों से जूझ रही है। एक तरह से कहा जा सकता है कि ऋतु परिवर्तन भी इस दौर में होते दिखाई दे रहा है। एक दौर में पहाड़ दैवीय आपदाओं को लेकर शीतकाल में सुरक्षित माने जाते रहे हैं।

वर्ष 2013 के 16-17 जून को ग्रीष्मकाल के दौरान केदारनाथ त्रासदी में असंख्य जाने गई थी। इस आपदा ने निजी और सरकारी परिसंपत्तियों को तहस-नहस कर रख दिया था। आपदा का कहर केदारनाथ ही नहीं अपितु चमोली जिले के पिंडर घाटी समेत बदरीनाथ घाटी पर भी कहर बरपाया था। यह सिलसिला तब से अब तक जारी है।

ग्रीष्मकाल में भी मौसमीय बदलाव के कारण ग्रीष्मकाल अथवा शीतकाल में भी तमाम तरह की दैवीय आपदाएं लोगों को झकझोर रही हैं। जोशीमठ ब्लॉक में रेणी हिमस्खलन की घटना में भी 200 से अधिक लोगों की जान तो गई ही अपितु निजी और सरकारी परिसंपत्तियां भी इस आपदा की चपेट में आई। यह घटना भी 7 फरवरी 2021 की है।

पहाड़ों में शीतकाल के इस दौर को बेहद सुरक्षित माना जाता है। फिर जोशीमठ भू-धंसाव की घटना भी शीतकाल में ही कहर बनकर टूट पड़ी। यह दौर भी जनवरी 2023 का है। कहा जा सकता है यह सब मौसमीय बदलावों का ही असर है कि पहाड़ न तो शीतकाल में सुरक्षित हैं और ना ही ग्रीष्मकाल में।

मानसून काल में तो पहाड़ों पर आपदाओं का कहर वर्षों से टूट पड़ता रहा है। जलवायु परिवर्तन अथवा मौसमीय बदलावों के इस असर से ही इस बार भी हिमालयी क्षेत्र प्रभावित तो हैं ही अपितु मैदानी क्षेत्रों पर भी मौसम की मार पड़ी है। जम्मू-कश्मीर और हिमाचल की पहाड़ियों पर छिटपुट बर्फवारी तो हुई किंतु उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों पर मौसम की अब तक की बड़ी मार पड़ती दिखाई दे रही है। जो पहाड़ियां इस दौर में बर्फ से लकदक हो जाती थी। इस बार यही पहाड़ियां बर्फ विहीन पड़ी हैं।

इन हिमालयी पहाड़ियों में बर्फवारी न होने से उनका शृंगार भी गायब हो चला है। हाल ही में चमोली के जिलाधिकारी गौरव कुमार और पुलिस अधीक्षक सुरजीत सिंह पंवार चीन सीमा से सटे नीती गांव के समीप स्थित टिम्मरसैण महादेव के दर्शनों को पहुंचे तो लोग हैरान भी रह गए।

एक दौर में इसी मौसम में तपोवन से आगे जाना बर्फ से इस इलाके के लकदख को जाने के कारण संभव नहीं हो पाता था। इस बार इसी मौसम में नीती गांव तक पहुंचना यह दर्शाता है कि मौसमीय बदलाव ने नीती गांव तक को नहीं छोड़ा है।
बदरीनाथ धाम के साथ ही आसपास की पहाड़ियां भी बर्फ विहीन बनी है। फूलों की घाटी व हेमकुंड साहिब पर भी मौसमीय बदलाव का असर बना हुआ है। हिमक्रीडा केंद्र औली में बर्फवारी न होने से प्रकृति प्रेमी भी निराश होकर लौटे हैं। हिमालय की तलहटी से सटे गांव भी इस बार बर्फवारी न होने से निराशा के दौर से गुजर रहे हैं।

पारिस्थितिकीय तंत्र पर जलवायु परिवर्तन के असर ने भविष्य की चिंताओं को बढ़ा दिया है। हालात यही रहे तो इसबार ग्रीष्मकाल में पानी का संकट खड़ा होने का अंदेशा बढ़ गया है। इसका असर उत्तराखंड ही नहीं अपितु अन्य राज्यों पर भी पड़ेगा और पानी के लिए मारामारी होगी।

अब सब कुछ भगवान भरोसे हो गया है। वैसे मकर संक्रांति से ठंड फीकी पड़ने लगती है किंतु इस बार सर्द हवाओं के चलते ठंड से निजात मिलनी बिन बारिश अथवा बर्फवारी से मुश्किल है। अब देखना यह है कि प्रकृति क्या रंग दिखाती है। इस पर ही यहां के वाशिदों का भविष्य निभर करेगा।

– रजपाल बिष्ट (उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार)

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