कोई मां कोई देवी है बुलाता.. सनातन की पहचान है गंगा
हृषिकेश बसंतोत्सव की साहित्यिक संध्या में ख्यातिप्राप्त कवियों ने बांधा समा

ऋषिकेश। हृषिकेश बसंतोत्सव 2026 के दूसरे दिन शाम साहित्य और संस्कृति के नाम रही। भगवान भरत की भूमि पर आयोजित राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में देश के ख्यातिप्राप्त कवियों ने अपनी ओजस्वी और भावनात्मक रचनाओं से श्रोताओं को मध्यरात्रि तक मंत्रमुग्ध किया।
बीते दिवस कवि सम्मेलन का शुभारंभ परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानंद सरस्वती ने किया। उन्होंने कहा कि कविता समाज की चेतना को जाग्रत करने का सबसे सशक्त माध्यम है। ऐसे आयोजन भारतीय सांस्कृतिक विरासत और साहित्यिक परंपरा को नई पीढ़ी से जोड़ने का कार्य करते हैं।
साहित्यिक संध्या की शुरुआत कवयित्री शिखा दीप्ति ने अपनी भावमयी सरस्वती वंदना “आखर-आखर हो हरियाली…” से की। उन्होंने अपनी रचना से पूरे सभागार को आध्यात्मिक और काव्यात्मक वातावरण में रंग दिया।
देश की चर्चित कवयित्री डॉ. अनामिका जैन अंबर ने आत्मविश्वास, संघर्ष और संकल्प से भरी अपनी पंक्तियों “सपनों का बोझ वहीं उठा सकते हैं अंबर, जिनकी रीढ़ हौसलों के दम पर खड़ी हो अंबर। मेरे गले में जीत की जो माला पड़ी है, मेहनत के मोतियों से बनाई वो लड़ी है।” से खूब वाहवाही बटोरने के साथ ही श्रोताओं, विशेषकर युवाओं में आत्मबल और सकारात्मक सोच का संचार किया।
कवि दुर्गेश तिवारी ने मां गंगा की महिमा का ओजस्वी स्वर में अपनी रचना “हमारी आन है गंगा, शान है गंगा, कोई मां कोई देवी है बुलाता, सनातन की पहचान है गंगा।” से गुणगान किया। उनकी इन पंक्तियों पर सभागार तालियों से गूंज उठा।
कवि प्रवीण पांडेय ने जीवन की कठिन राहों और संघर्षों को नदी के रूपक ढालते हुए सुनाया “मीठी नदिया जिसकी मंज़िल खारी-खारी है, जीवनभर आराम न पाने की लाचारी है।”
वहीं, प्रसिद्ध कवि जॉनी बैरागी, आशीष अनल और आश्विन पाण्डेय ने हास्य, व्यंग्य, प्रेम और समकालीन सामाजिक विषयों पर अपनी रचनाएं पेश कर कवि सम्मेलन को बहुरंगी स्वर प्रदान किए।
मौके पर भरत मंदिर के महंत वत्सल प्रपन्नाचार्य, मुन्ना शर्मा, मेला संयोजक दीप शर्मा, विनय उनियाल, रवि शास्त्री, राहुल शर्मा, यमुना प्रसाद त्रिपाठी, डॉ. सुनील थपलियाल, रंजन अंथवाल, बंशीधर पोखरियाल आदि मौजूद रहे।



